Sunday, November 30, 2014

कुछ अपना सा था...

चला आता हूँ,
उन राहों पर,
यादों को लिए पुरानी,
उन राहों पर ऐसा लगता,
सब कुछ पुराना सा,
कुछ अपना सा है।
कदम खींच ले आती उन रास्ते पर,
जहाँ कुछ पल बिताएँ थे,
ख़्वाबों को बुनते हुए,
जहाँ रिश्तों को बुना था,
एक नए सिरे से जो,
कुछ अपना सा है।
मगर कहीं दिल में,
एक कसक सी लगी पड़ी,
है कहीं कुछ छूट सा गया,
उन राहों पर जहाँ,
कभी गूंजती थी हँसी अपनी,
कभी खिलखिलाते थे साथ बैठ,
मगर छुट सा गया वो सब जो,
कभी कुछ अपना सा था।

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