Thursday, November 6, 2014

ओ रे गौरेया तू उड़ चली किन राहों पर...

ओ गौरैया,
किधर उड़ चली तू,
सुनसान कर इन राहोँ को,
तू यादों में बसी हैं इस कदर,
तेरी आवाज गूंजती इन कानों पर,
तू भूल चुकी उन राहोँ को,
जहाँ कलरव तुम किया करते थे,
ये राहें इंतज़ार किया करते हैं,
कभी तो गौरैया फिर आ जाएगी,
चहचहायेगी इन बागों में।
ओ रे गौरेया तू उड़ चली किन राहों पर।

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