तुम हो गए हो क्यूँ इस कदर,
न परवाह करते तुम खुद की।
जरा देखो दुनिया की तरफ,
वो बदल रही है खुद को।
तुम अड़े हुए हो उस जगह पर,
जहाँ मरुभूमि है हर पल,
जी लोगे किसी तरह तुम,
मगर जल की तलाश अधूरी है,
तुम हो गए हो क्यूँ इस कदर।
उस मरीचिका को देख तुम,
दिग्भ्रमित क्यूँ हो चले हो?
जिस निर्मल जल की तलाश तुझे है,
वो मिलेगा कहीं और करता हुआ कलकल।
तुम सोच रहे हो क्यूँ ऐसा,
मरुभूमि में जल संचार होगा,
बारिश की बुँदे पड़ते हीं,
जहाँ वाष्प बन उड़ जाती है ठंडक।
तू तलाश कर उस जीवन की,
जहाँ मिलेगा वो कलकल करता निर्मल जल।
कठिनाई है रास्ते में,
गर प्यास तेरी वहाँ तृप्त होगी।
तू भूल उस मरीचिका को,
खुद के जीवन की तलाश कर।
खुद के जीवन की तलाश कर।।
न परवाह करते तुम खुद की।
जरा देखो दुनिया की तरफ,
वो बदल रही है खुद को।
तुम अड़े हुए हो उस जगह पर,
जहाँ मरुभूमि है हर पल,
जी लोगे किसी तरह तुम,
मगर जल की तलाश अधूरी है,
तुम हो गए हो क्यूँ इस कदर।
उस मरीचिका को देख तुम,
दिग्भ्रमित क्यूँ हो चले हो?
जिस निर्मल जल की तलाश तुझे है,
वो मिलेगा कहीं और करता हुआ कलकल।
तुम सोच रहे हो क्यूँ ऐसा,
मरुभूमि में जल संचार होगा,
बारिश की बुँदे पड़ते हीं,
जहाँ वाष्प बन उड़ जाती है ठंडक।
तू तलाश कर उस जीवन की,
जहाँ मिलेगा वो कलकल करता निर्मल जल।
कठिनाई है रास्ते में,
गर प्यास तेरी वहाँ तृप्त होगी।
तू भूल उस मरीचिका को,
खुद के जीवन की तलाश कर।
खुद के जीवन की तलाश कर।।
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